रायपुर/अमृत टुडे। 21 वीं सदी में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि भारत में ऐसा कोई गाँव भी है, जहाँ आज
भी सड़क से नहीं पहुँचा जा सकता, जहाँ राशन का पहुँचना भी दुलभ है। पर छत्तीसगढ़ के
सुकमा जिले में ऐसा एक गाँव है-भोमापुरम। मावादियों ने इसे कभी सड़क से जुड़ने ही नहीं
दिया। वाकी शिक्षा- स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन आप इससे कर ही सकते हैं।
इसी गाँव में रहती है – मड़कम सुकी, जो आज 14 वर्ष की है। जब वह महज तीन वर्ष की थी,
उसके सिर से माँ का हाथ उठ गया। और आज से तीन साल पहले उसके पिता भी माओवादियों द्वारा दी गई सजा से चल बसे। महज 11 वर्ष की अवस्था तक सुरकी ने दो बड़े झटके सहे थे।
वह उनसे उबर भी न पाई थी कि इसी साल 26 मई 2024 को वह महुए के पेड़ के नीचे टोरा
बीनते समय माओवादियों के लगाए 1ED की चपेट में आ गई। इस धमाके से घुटने के
नीचे का उसका बायाँ पैर उह गया। दुर्गम गाँव में उसे तत्काल उपचार भी नहीं मिला। बड़ी
मुरिकल से किसी तरह सुकमा लाकर उसका इलाज शुरु किया गया। पर चाहे जो हो, उसका
बायाँ पैर कभी वापस नहीं आ सकेगा।
बचपन में ही माता-पिता कोर खो देने वाली सुकी ने युवावस्था में जाने से पहले अपना
एक पैर भी गैवा दिया है। उसका दुःख और उसकी पीड़ा दोनों ही अकल्पनीय है।
इसे ही दिल्लीवासियों से बांटने मड़कम सुकी दिल्ी आई है।इस प्रेस वार्ता के दौरान नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवान मोहन उइ़के की विधवा पत्नी ने अपने आंसुओं के साथ बताया कि कैसे माओवादियों ने सलवा जुड्रम पर प्रतिबंध लगने के बाद उनके पति को एम्बुश लगाकर बलिदान कर दिया। वो कहती हैं कि जब उनके पति बलिदान हुए तब उनके गोद में 3 महीने की बच्ची थी, जिसने कभी अपने पिता को देखा ही नहीं।
आज इस प्रेस वार्ता में अपनी माँ के साथ उनकी 10 वर्षीय बेटी भी गुहार लगाने पहुंची थी।
चिंगावरम हमले के पीड़ित महादेव दूधी ट्टी फूटी हिंदी बोलते हैं, लेकिनि फिर भी अपनी इसी हिंदी और गोडी में उन्होंने बताया कि कैसे माओवादियों ने दंतेवाड़ा से जा रही आम यात्री बस को निशाना बनाया,जिसमें 32 लोग मारे गए। वहीं इस हमले में महादेव ने अपना एक पैर खो दिया। आज वो अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
बस्तर शांति समिति के जयराम ने इस पूरी प्रेस वार्ता के बारे में बताया कि नक्सल पीड़ितों ने दिल्ली जाकर अपनी पीड़ा और अपने दुःख को साझा किया और अब रायपुर में भी अपनी पीड़ा बता रहे हैं। उनका कहना
है कि पीड़ित यही चाहते हैं कि देश सम्मानीय सांसदगण ऐसे किसी भी व्यक्ति का समर्थन ना करें जिन्होंने उनकी जिंदगी को और बस्तर की शांत भूमि को नर्क बना दिया। वहीं बस्तर शांति समिति के ही मंगउऊ राम
कावड़े का कहना है कि इन पीड़ितों ने सभी सांसदों को पत्र लिखकर भी यही गुहार लगाई है कि वो सुदर्शन रेड्टी का समर्थन ना करें। उन्होंने बताया कि बस्तर में ऐसे हजारों परिवार हैं जो सलवा जुड्म पर प्रतिबंध
लगने के कारण प्रताड़ित हुए और नक्सल आतंक का दंश झेला, और आज वो सुदर्शन रेड्टी की इस उम्मीदवारी से बेहद आहत हैं।

