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भ्रम की स्थिति खत्म: दीपावली 20 अक्टूबर को ही मान्य

रायपुर, 17 अक्टूबर 2025

अमृत टुडे। दीपावली उत्सव का इस वर्ष भी निर्णय जन सामान्य के लिए भ्रम की स्थिति पैदा करने वाला बन गया है यह उत्सव 20 को है या 21 को आइये इसके पीछे के शास्त्रीय और प्रामाणिक तर्क पर महावास्तु और ज्योतिष आचार्य अभिऋषि व्यास के साथ विश्लेषण करते है जो लोग 21 का प्रमाण दे रहे है उनके तर्क निम्न प्रमाणों से खंडित होते है :-

यह सबसे अधिक उद्धृत ग्रंथ है। वाक्यांश वहाँ आता है —
“यदा द्वयोरपि प्रदोषव्याप्तिः तदा पूर्वेद्युरेव दीपोत्सवः। दण्डकरजनीयोगे दर्शः स्यात् परेऽहनि तदाविहाय पूर्वेद्युः परेऽहनि सुखरात्रिकेति।”

अर्थ और संदर्भ:
यह दीपोत्सव निर्णय का मुख्य सूत्र है। यह दो स्थितियाँ बताता है —
यदि अमावस्या दोनों प्रदोषकालों (दोनों दिनों की संध्याओं) में हो, तो पहले दिन दीपोत्सव।
यदि दूसरे दिन “रजनी (रात्रि)” में कम से कम 1 दण्ड अमावस्या शेष हो, तो दूसरे दिन श्राद्ध या सुखरात्रि कर्म।
लेख में त्रुटि:
अक्सर लोग “दण्डकरजनीयोग” को गलत पढ़कर यह समझ लेते हैं कि अगर दूसरे दिन थोड़ा भी अमावस्या रहे (चाहे प्रदोष में, चाहे रात्रि में), तो वही मान्य है।
पर श्लोक कहता है — “दण्डकरजनीयोगे दर्शः स्यात्” यानी वह स्थिति जब रात्रि (मध्यरात्रि) में अमावस्या हो — न कि सिर्फ संध्या में।
इसलिए यदि दूसरे दिन केवल प्रदोष में थोड़ी अमावस्या रहती है, रात्रि में नहीं, तो यह सूत्र लागू नहीं होता। यह गलती कई आधुनिक लेखों में हुई है।

समझिये रजनी का अर्थ :-

दण्डकरजनीयोग” का प्रयोग वहाँ गलत रूप में हुआ है — उन्होंने यह मान लिया कि यदि दूसरे दिन प्रदोष में 1 दण्ड अमावस्या है, तो वही शास्त्रोचित है।
परंतु शास्त्र कहता है कि रजनी का तात्पर्य प्रदोष से नही है अपितु प्रदोष काल के बाद से है और इसको स्पष्ट करते हुए तिथि निर्णय एवं पुरुषार्थ चिंतामणि आदि ग्रंथो में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि सूर्यास्त के अनंतर तीन मुहूर्त तक प्रदोष एवं उसके बाद की
रजनी संज्ञा होती है।

नक्षत्रदर्शनात्संध्या सायं तत्परतः स्थितम ।

तत्परा रजनी ज्ञेया पुरुषार्थ चिंतामणि।

उदयात् प्राक्तनी संध्या घटिकाद्वयमिष्यते । सायं सन्ध्या त्रिघटिका अस्तादुपरि भास्वतः॥

त्रिमुहूर्तः प्रदोषः स्याद् भानावस्तंगते सति । तत्परा रजनी प्रोक्ता तत्र कर्म परित्यजेत ॥ तिथिनिर्णय ।।

त्रियामां रजनी प्राहुस्त्यक्त्वाद्यन्तचतुष्ट्या नाडीनां तदुभे सन्ध्ये दिवसाद्यन्तसंज्ञके ।।

इन धर्मशास्त्रीय वचनो से यह स्पष्ट हो रहा है कि रजनी प्रदोष नही अपितु प्रदोष काल के बाद की संज्ञा है अतः दंडकरजनीयोगे दर्शः स्याजु परेऽहनि ।

के अनुसार 21 को अमावस्या का रजनी से कोई योग भी नही हो रहा है। अतः 21 नवंबर को अमावस्या का प्रदोष के एक भाग से संगति हो भी रही है वहां पर रजनी से अमावस्या का किसी भी स्थिति में योग नही हो रहा है अतः उनके मत से भी अग्रिम दिन दीपावली नही होगी। इसको पुष्ट करने
“धर्मसिन्धु” व “कालप्रकाशिका” की दृष्टि से ऐसी अमावस्या “अल्पव्याप्ता” मानी जाती है — त्याज्य।

इसलिए उनके द्वारा दिए गए शास्त्रीय संदर्भ उद्धृत तो सही हैं, पर उनका प्रयोग और संदर्भ-सापेक्ष निष्कर्ष गलत है।

2 धर्मसिन्धु (दीपावलीव्रतविधिः)
वाक्यांश: “अल्पव्याप्ता तिथिः त्याज्या। प्रदोषव्याप्ता ग्राह्या।”
अर्थ:
यदि अमावस्या प्रदोषकाल में थोड़ी (अल्प) अवधि के लिए ही है, तो उसे त्याज्य (श्राद्धयोग्य) माना गया है। दीपावली का पूजन ऐसी अमावस्या में नहीं किया जाता।
लेख की स्थिति:
यदि किसी लेख में लिखा है कि “दूसरे दिन 1 दण्ड प्रदोषकाल में अमावस्या” है, तो धर्मसिन्धु का यह श्लोक सीधा उस निर्णय के विपरीत है।
क्योंकि एक दण्ड (24 मिनट) को “अल्पव्याप्ति” कहा जाता है, न कि ग्राह्य।

  1. काम्यकर्मप्रकाश / कालप्रकाशिका
    कुछ ग्रंथों (जैसे कालप्रकाशिका) में लिखा है —
    “यत्र प्रदोषे तिथिः स एव मुख्यः। परदिनव्याप्ता क्षणमात्रं न ग्राह्या।”
    यह भी उपर्युक्त नियम को ही बल देता है। अर्थात “क्षणमात्र (1 दण्ड या उससे कम)” व्याप्ति का कोई मान नहीं।

4.वैश्वानरसंहिता (ब्रह्मपुराणान्तर्गत)
वाक्यांश: “प्रदोषव्याप्ते दर्शे तु दीपोत्सवः विधीयते। परदिने तु न कर्तव्यं यदा उभयत्र व्याप्यते॥”
यह वही प्रमाण है जिसे पहले भी बताया गया था — दोनों प्रदोषकालों में अमावस्या हो तो पहले दिन दीपोत्सव करना चाहिए।

  1. स्वयंभूकल्प / कमलाकरभट्ट
    कई आधुनिक आचार्य कमलाकरभट्ट की टिप्पणी उद्धृत करते हैं —
    “द्वादशाध्यायी पंचमाध्याय दीपोत्सवविचारप्रकरणे प्रदोषकालं कारणं।”
    अर्थात दीपोत्सव का काल निर्णायक प्रदोषकाल है — अन्य किसी काल का नहीं।
    यदि लेख में इसका उपयोग हुआ है, तो इसका अर्थ स्पष्ट यही है: प्रदोष में जो तिथि है, वही ग्राह्य।

अब भले ही अमावस्या 20 तारीख की प्रदोषकाल में आरंभ हो रही हो, लेकिन चूँकि वह 21 तारीख को सूर्यास्त के कुछ मिनट बाद (5:55 तक) चल रही है और 21 की प्रतिपदा रात 8:17 तक वृद्धिगामिनी है, इसलिए 21 की अमावस्या ही ग्राह्य है। अब इस तर्क का आधार उन्होंने किन शास्त्रों पर रखा है, देखते हैं।
उनके 5 उद्धरणों का क्रमवार विश्लेषण

(1) “अथाश्विनामावास्यायां प्रातरभ्यंगः प्रदोष दीपदान लक्ष्मीपूजनादि विहितम्। तत्र सूर्योदयं व्याप्तिः अस्तोत्तर घटिकाधिकरात्रिव्यापिनी दर्श सति संदेहः।”
अर्थ:
यदि अमावस्या का सूर्योदय तक और फिर सूर्यास्त के पश्चात भी कुछ समय (घटिकामात्र) व्याप्ति हो — तो उसी दिन दीपदान व पूजन में संदेह नहीं है।
संदर्भ:
यह “निर्णयसिन्धु” के पूर्व भाग से नहीं, बल्कि “काम्यकर्मप्रकाश / कालप्रकाशिका” प्रकार के ग्रंथों की परंपरा से लिया गया है, जहाँ “उदयव्याप्ति + अस्तोत्तर व्याप्ति” को एक साथ शुद्ध मानने की बात होती है।
स्थिति (20–21 अक्टूबर 2025):
21 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद भी अमावस्या है, सूर्यास्त (5:55) तक भी थोड़ी अमावस्या रहती है। इसलिए इस नियम से देखा जाए तो, 21 को अमावस्या का उदय + अस्त व्याप्ति दोनों हैं।
परंतु यह श्लोक “दीपोत्सव” नहीं, “अभ्यंग स्नान” (कार्तिक स्नान) की सन्दर्भ पंक्ति से आता है — और अभ्यंग स्नान और लक्ष्मी पूजन में तिथि नियम एक समान नहीं होते।
धर्मसिन्धु स्वयं कहता है — “अभ्यङ्गस्नानं सूर्योदयव्याप्त्यां तिथौ, पूजनं प्रदोषव्याप्त्यां।”
अर्थात यह उद्धरण पूजन के लिए नहीं, स्नान के लिए है — इसलिए दीपोत्सव पर इसका प्रयोग शास्त्रानुकूल नहीं।

(2) “परदिने एव दिनद्वयेपि वा प्रदोषव्याप्तौ परा। पूर्वत्रैव प्रदोषव्याप्तौ लक्ष्मीपूजनादि पूर्वा।। ”
अर्थ:
यदि दोनों दिनों में प्रदोषकाल में अमावस्या है या अगले दिन भी प्रदोषकाल में है, तो दूसरा दिन ग्रहण करना चाहिए। यदि केवल पहले दिन है, तो पहला दिन।
वास्तविक स्थिति:
20 तारीख की शाम को प्रदोषकाल में अमावस्या व्याप्त है।
21 तारीख को सूर्यास्त (17:55) तक तो है, पर प्रदोषकाल के मध्य भाग (संध्या के बाद) में समाप्त हो जाती है — यानी पूर्ण प्रदोष में नहीं।
इसलिए यह शर्त “दिनद्वये प्रदोषव्याप्तौ परा” यहाँ पूरी नहीं होती।
21 तारीख “प्रदोषव्याप्त” नहीं है, “अल्पव्याप्त” है।

(3) “इयं प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या। दिनद्वये सत्तासत्त्वे परा।। ”
अर्थ:
यदि दोनों दिनों में व्याप्ति का संदेह हो (एक दिन पूर्ण, एक दिन अल्प), तो दूसरा दिन ग्रहण किया जाए।
स्थिति:
यह “संदेह” की स्थिति नहीं है — गणना स्पष्ट है कि अमावस्या 20 की शाम से 21 की शाम तक है, पर 21 की संध्या के मध्य भाग में समाप्त हो जाती है।
यहाँ कोई “सत्तासत्त्व-संदेह” नहीं, बल्कि अल्पव्याप्ति है — जिसे धर्मसिन्धु त्याज्य कह चुका है।
अतः यह श्लोक यहाँ अप्रयोज्य है।

(4) तिथि युग्म के आधार पर “प्रतिपदायुक्त अमावस्या” को ग्रहण करने की बात की गई है।
अर्थ:
जब दो तिथियाँ एक साथ जुड़ी हों — तो “प्रतिपदायुक्त अमावस्या” ग्राह्य मानी जाती है।
अब 20–21 की स्थिति देखें — 21 की संध्या में प्रतिपदा शुरू हो रही है (अमावस्या सूर्यास्त के बाद तुरंत समाप्त)।
इसलिए यह “प्रतिपदायुक्त अमावस्या” है। इस बिंदु से वे 21 को ग्रहण करते हैं।
परंतु यह नियम केवल “श्राद्धादि कर्मों” के लिए उपयोगी है — जहाँ “उदयव्याप्ति” और “युग्म तिथि” प्रधान होती है।
“दीपोत्सव” में तिथि “प्रदोषव्याप्त” होनी चाहिए, न कि “प्रतिपदायुक्त।”
अतः यह श्लोक दीपावली निर्णय के सन्दर्भ में अप्रासंगिक है।

(5) पुरुषार्थचिन्तामणि का उद्धरण —
“पूर्वत्रैव व्याप्तिरिति पक्षे परत्र यामत्रयाधिकव्यापिदर्श दर्शापेक्षया प्रतिपदवृद्धिसत्त्वे लक्ष्मीपूजादिकर्माय परत्रैवेत्युक्त्तम्।”
अर्थ:
यदि पहले दिन प्रदोषकाल में अमावस्या हो, परंतु अगले दिन वह तीन याम (साढ़े तीन प्रहर) से अधिक रात्रि तक रहती हो, और प्रतिपदा तिथि वृद्धि (वृद्धिगामिनी) हो, तो लक्ष्मीपूजन अगले दिन किया जाए।
स्थिति:
21 तारीख की अमावस्या सूर्यास्त के बाद केवल कुछ मिनट है, “तीन याम” से बहुत कम। प्रतिपदा वृद्धिगामिनी है (सही है), लेकिन “यामत्रयाधिकव्याप्ति” नहीं है।
अतः यह सूत्र यहाँ लागू नहीं होता।

यहाँ याम का अर्थ रात्रि गणना से ही है दिन भर से नहीं व्याकरणिक पक्ष (Etymological & Vyākaraṇa view)

शब्द: याम (पुल्लिङ्ग / नपुंसकलिङ्ग)
धातु: √या (गमन) + मन् प्रत्यय (भाववाचक) → याम = गमन, काल-गमन, रात्रि-गमन

अर्थ: “जो चलता है”, “जो रात्रि या काल में चलता है” — इसीलिए याम का प्रयोग “गतिविशिष्ट कालांश” के लिए हुआ।
पाणिनि सूत्र: धातोः भावे (3.3.18) — या + मन् = याम, “गमन का भाव”।

अर्थात व्याकरण की दृष्टि से “याम” शब्द “चलने वाले कालांश” का बोध कराता है —
और यह गमन सूर्यास्त के पश्चात रात्रिकाल में समय का प्रवाह माना गया।

निरुक्त (यास्काचार्य):

“यामः कालगमनः। यस्मिन्गच्छन्ति तारा इति।”—
याम वह है जिसमें तारे गतिशील दिखाई देते हैं, अर्थात रात्रिकाल।

इससे यह स्पष्ट कि व्याकरण और निरुक्त — दोनों दृष्टियों से याम = “कालगति का रात्रिकालीन अंश”।

  1. वैदिक पक्ष (Vedic and Philosophical sense)

ऋग्वेद में “याम” शब्द का प्रयोग कई बार “रात्रिकालीन अवस्था” या “दैवी संचरण” के अर्थ में हुआ है। उदाहरण —

“यामं नो अग्ने सुषमं नयस्व।” (ऋग्वेद 1.1.8)
यहाँ “यामं” का अर्थ है — रात्रि के समय में सुरक्षित मार्ग।

इसलिए जब “यामत्रयाधिकव्याप्ति” कहा जाता है —
तो उसका अर्थ है — रात्रि के तीन या अधिक यामों तक अमावस्या का बने रहना।
इस आधार पर भी ऊपर लिखें श्लोक का अर्थ लोगो के द्वारा गलत निकला गया और निर्णय 21 को दे दिया गया।

(इसी सूत्र के अंत में लिखा है जिसको 21 का मत रखने वाले नहीं छापते )—

“तदाविहाय पूर्वेद्युः…”, यानी यदि यामत्रयाधिक न हो तो पूर्व दिवस ही ग्राह्य।)
वस्तुनिष्ठ निर्णय (शास्त्रानुसार)
अमावस्या 20 अक्टूबर की दोपहर से 21 अक्टूबर की शाम तक है।
20 की संध्या में पूर्ण प्रदोषकाल में व्याप्त है।
21 की संध्या में केवल 1 दण्ड (20 मिनट) ही प्रदोष में शेष है।

धर्मसिन्धु — अल्पव्याप्ता त्याज्या।
निर्णयसिन्धु — दण्डकरजनीयोगे दर्शः स्यात् परेऽहनि।
पुरुषार्थचिन्तामणि — यामत्रयाधिकव्याप्त्यां परदिने।
यहाँ न “यामत्रयाधिक” है, न “रजनीयोग” — इसलिए “पूर्व दिवस (20 अक्टूबर)” ही शास्त्रसम्मत है।

अंतिम निर्णय (पूर्ण विवेचना के बाद)
21 के मत मे उद्धृत सभी श्लोक सही हैं, लेकिन लेखको ने उनका प्रयोग गलत परिस्थिति पर किया है। उनका सन्दर्भ गलत लिया है
पुरुषार्थचिन्तामणि का “यामत्रयाधिक” नियम लंबी रात्रि-व्याप्त अमावस्या के लिए है, न कि केवल 20–25 मिनट की अल्प व्याप्ति के लिए।
धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु दोनों कहते हैं कि “अल्पव्याप्ता अमावस्या त्याज्या।”

अतः 21 अक्टूबर 2025 को दीपावली मानना शास्त्रार्थ दृष्टि से गलत है।

शास्त्रसम्मत दीपावली 20 अक्टूबर 2025 (सोमवार) प्रदोषकाल में ही है।

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