“धीरेंद्र शास्त्री-प्रदीप मिश्रा मामलों में जलन; सनातन जागृति बर्दाश्त नहीं, ओछे शब्दों की निंदा“
रायपुर ,02 जनवरी 2026
अमृत टुडे। वक्ता ने कहा कि मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री धीरेंद्र शास्त्री, प्रदीप मिश्रा व छत्तीसगढ़ उपमुख्यमंत्री अरुण साव पर बयानों से जलन झलकती है। वे सनातन जागृति व भीड़ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। बड़े पद के अनुरूप ओछे शब्दों का उपयोग दुर्भाग्यजनक।
विवरण पूर्व मुख्यमंत्री दिव्य सपने से बाहर नहीं निकले, खुद कार्यक्रमों में जाते थे। अरुण साव के दौरे से अचंभित, कमियां छिपाने को बेवजह हमला। आने वाले समय पर टिप्पणी अधर में रही। यह सनातन भावना व नेतृत्व पर राजनीतिक टकराव दर्शाता है।

मेरे मन में एक विशेष चिंता का विषय बनता जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों से मणिपुर के मुख्यमंत्री जिस तरह के बयानों का ताता लगाकर अपनी बात रख रहे हैं, वह वास्तव में न केवल चिंताजनक है बल्कि अव्यवसायिक भी प्रतीत होता है। चाहे यह मामला धीरेंद्र शास्त्री का हो, पंडित प्रदीप मिश्रा महाराज का, या फिर माननीय उपमुख्यमंत्री अरुण साव का, उनके बयानों में एक असमंजस की स्थिति दिखती है। ऐसा लगता है कि वे शायद स्थिति को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर वे अपने दृष्टिकोण से बाहर आने में असमर्थ हैं।
मुख्यमंत्री ने पूर्व में जिस प्रकार से प्रदीप मिश्रा महाराज के कार्यक्रमों में भाग लिया था और खुद को उस समय काफी महत्वपूर्ण और सम्मानित व्यक्ति के रूप में देखा था, वह उनके मौजूदा बयानों के संदर्भ में एक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न करता है। वे उस उत्सव के माहौल में खुद को काफी प्रभावित महसूस करते थे, इस तथ्य को कोई भी नकार नहीं सकता। वहीं, जब वे धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रम में भाग लेते थे, तब भी उन्हें भीड़ और धार्मिक जागरूकता की भावना में एक तरह की संतोष प्रदता का अनुभव होता था।

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि इस समय उनके बयानों में जो भावनाएं प्रदर्शित हो रही हैं, वह न केवल उनके व्यक्तिगत विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि उस धार्मिक जागरूकता को भी सीमित करने का प्रयास करती हैं, जो समाज में तेजी से पनप रही है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव के बारे में उनकी टिप्पणियों को देखकर ऐसा लगता है कि वे उनकी सार्वजनिक छवि से प्रभावित होकर अपनी कमियों को छुपाने के लिए ऐसे ओछे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं।
यह अत्यंत दुर्भाग्य जनक और निंदनीय है कि एक उच्च पद पर रहने वाले व्यक्ति ने अपने शब्दों के चयन में इस प्रकार की लापरवाही बरती है। इस प्रकार के बयान न केवल राजनीतिक गरिमा को चोट पहुँचाते हैं, बल्कि समाज में भी गलत संदेश फैलाने का कार्य करते हैं। ऐसी स्थिति में, हमें इस प्रकार की चर्चा और बयानबाज़ी पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।


