रायपुर, 24 सितम्बर 2025
अमृत टुडे। सुशील आनंद शुक्ला ने यह स्पष्ट रूप से व्यक्त किया कि ,
वक्फ बोर्ड, जो कि एक महत्वपूर्ण संस्थान है, वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के टूल किट के रूप में कार्य कर रहा है। उन्होंने यह भी इंगित किया कि वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष लगातार ऐसे बयानों का सहारा लेते रहते हैं जिससे उनका अपना राजनीतिक अस्तित्व बना रह सके, खासकर भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में।

इस पर जोर देते हुए,
शुक्ला ने फिर से कहा कि गरबा का आयोजन विशेष रूप से हिंदू धर्म की संस्कृति के अनुसार माता की आराधना के पर्व के रूप में होता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इस उत्सव में किसी भी अन्य धर्म के लोग शामिल नहीं होते हैं, और उन्होंने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी किसी हिंदू को मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ते हुए नहीं देखा है। इसी प्रकार, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने किसी मुस्लिम व्यक्ति को गरबा के समारोह में पूजा करते हुए नहीं देखा है, जो कि उनके अनुसार, इस बात का प्रमाण है कि यह एक विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है।

इसके साथ ही,
वह इस बात पर जोर देते हैं कि यह भारतीय जनता पार्टी का एक प्रकार का प्रचार है, जो इस प्रकार का वातावरण बना रही है कि हिंदू समुदाय खतरे में है और इस तरह की स्थिति उत्पन्न करने का प्रयास कर रही है।
पहली बात यह है कि ,
वर्तमान में सभापति द्वारा किसी भी प्रकार का सार्वजनिक बयान या टिप्पणी सामने नहीं आई है, जो कि इस मामले की प्रासंगिकता को कायम रखने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस समय, एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि कांग्रेस पार्षदों ने अपने अभिमत किस पक्ष में प्रस्तुत किए हैं। इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पार्षदों ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ जाकर कोई निर्णय लिया है।
दूसरी बात,
यह जानना आवश्यक है कि सभापति ने किस विशेष निगम के एक्ट के तहत इस प्रक्रिया का परीक्षण किया है। इस बिंदु पर, यह भी ध्यान रखना होगा कि सभापति के अधिकार सीमित हैं और उन्हें उन सीमाओं के भीतर कार्य करना चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक पत्रक पर स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि अमुख व्यक्ति को पार्टी ने अपने पार्षद दल का नेता चुना है।
ऐसे में,
परंपरागत राजनीति के अनुसार, सभापति को उन्हें नामित करना चाहिए।
हालांकि,
यह दर्शाता है कि वे राजनीतिक खेल करने के प्रयास में लगे हुए हैं, जो किसी भी दृष्टिकोण से राजनीति की स्तरहीनता को प्रदर्शित करता है।
इस संदर्भ में,
कांग्रेस पार्टी की ओर से स्पष्ट रूप से आकाश तिवारी का नाम नामांकित किया गया है, और यह नामांकन पीसीसी द्वारा लिखित रूप में भेजा गया है, साथ ही जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा भी इस मामले में औपचारिक संचार किया गया है। ऐसी स्थिति में, पार्षदों और राजनीति के इस महत्वपूर्ण क्षण में सभी संबंधित पक्षों की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।
अब उसके बाद में जब वो बोल रहे हैं, तो मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या राज्यपाल ने विष्णु देव साय को मुख्यमंत्री नियुक्त करने से पूर्व केवल एक ही विधायक की अनुमति ली थी, या केवल एक ही विधायक से चर्चा की थी यह तय करने के लिए कि क्या विष्णु देव साय को मुख्यमंत्री बनाना उचित है या नहीं। इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि क्या बृजमोहन अग्रवाल को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर विचार किया गया या नहीं। यह स्थिति संवैधानिक दृष्टिकोण से भी ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यदि राज्यपाल ऐसा करते हैं, और यदि वे बहुमत दल के सदस्यों से अधिक संवाद स्थापित करते हैं, तो उनके पास ऐसा करने का संवैधानिक अधिकार भी है।
लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में,
हमें यह भी देखना होगा कि यहां सभापति को इस प्रकार का अधिकार नहीं है। वास्तव में, सभापति का मुख्य कार्य केवल सामान्य सभा का संचालन करना है, और नियमों तथा अधिनियमों के तहत उनके पास कोई अन्य शक्ति या अधिकार नहीं है। इसलिए, इस मुद्दे पर स्पष्टता आवश्यक है ताकि यह समझा जा सके कि क्या प्रक्रिया का पालन किया गया है या नहीं।
कांग्रेस कमेटी ने जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए,
एक नया और प्रभावी कार्यक्रम चालू किया है, जिसका नाम है “संगठन सृजन कार्यक्रम।” इस विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत, कांग्रेस पार्टी के विभिन्न वरिष्ठ नेताओं को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चयनित किया जाता है, जिन्हें आब्जर्वर के रूप में नियुक्त किया जाता है। ये आब्जर्वर, जो कि पार्टी के अनुभवी और समर्पित सदस्य होते हैं, स्थानीय नेताओं के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
इस प्रक्रिया में,
आब्जर्वर स्थानीय क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों का गहन अध्ययन करते हैं और एक-एक व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं। यह मुलाकातें बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि इनसे उन्हें यह समझने में मदद मिलती है कि क्षेत्र में राजनीतिक माहौल किस तरह का है।
इसके साथ ही,
वे आवेदन करने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व का भी परीक्षण करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो व्यक्ति जिलाध्यक्ष के पद के लिए उचित है, वह सही चयन किया जाए।
एक बार जब परीक्षण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और उचित आंकलन किया जाता है, तब इन आब्जर्वर्स द्वारा संबंधित अनुशंसा भेजी जाती है, जिसके आधार पर जिला अध्यक्ष की नियुक्ति का निर्णय लिया जाता है। यह कार्यक्रम राहुल गांधी की उस मंशा के अनुरूप है, जिसमें कांग्रेस पार्टी को और अधिक मजबूत करना और जिला अध्यक्षों को सशक्तिकरण प्रदान करना शामिल है। इससे न केवल पार्टी का आधार मजबूत होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी कांग्रेस की उपस्थिति और प्रभाव को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकेगा।
बृजमोहन अग्रवाल के पद का हम स्वागत करते हैं,
भले ही यह स्वागत थोड़ा विलम्बित हो। यह सही है कि देर आयत दुरुस्तायत, लेकिन इस स्थिति में एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है। बृजमोहन अग्रवाल, जो कि इस प्रदेश में 15 वर्षों तक मंत्री रह चुके हैं, वास्तव में एक बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं। जहां तक मेरी यादाश्त में है, उन्होंने एक अवसर पर उच्च शिक्षा विभाग का भी प्रभार संभाला था, जो उनके नेतृत्व की गुणवत्ता को दर्शाता है।
अब जब वह मंत्री मंडल से बाहर हो चुके हैं,
तो यह देखने योग्य है कि वो सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए पत्र लिखने का सहारा ले रहे हैं। इसके बावजूद, हम उनका स्वागत करते हैं, क्योंकि यह स्वागत न केवल उनकी पूर्व सेवाओं को मान्यता देता है, बल्कि हमें यह भी दिखाता है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है।
हमारे युवा वर्ग के लिए हर साल से सेट (SET) और टेट (TET) का आयोजन अनिवार्य होना चाहिए। यदि ये परीक्षाएँ हर साल आयोजित नहीं होती हैं, तो हमारे युवा एक संपूर्ण वर्ष बर्बाद कर देते हैं, जो उनकी पेशेवर आकांक्षाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, हमें केवल इस पर चर्चा ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि छत्तीसगढ़ के युवाओं को स्थानीय भर्ती में प्राथमिकता देने के लिए एक ठोस अधिनियम भी बनाना चाहिए।
जैसा कि वर्तमान में अतिथि व्याख्याताओं की भर्ती में ग्लोबलाइजेशन का प्रयोग किया जा रहा है और राज्य के बाहर के लोग केंडल के माध्यम से आ रहे हैं, इस प्रकार की प्रथा को समाप्त करना अत्यावश्यक है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे प्रदेश के युवा को स्थानीय अवसरों में पहली प्राथमिकता मिले, ताकि उन्हें रोजगार के लिए अपने राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता न पड़े।

