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*“विनोद कुमार शुक्ल का जाना भारतीय कविता के एक पूरे युग का अवसान है” – कुमार विश्वास*

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*”हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति”*

रायपुर ,24 दिसम्बर 2025

अमृत टुडे। हिंदी साहित्य और भारतीय कविता जगत के लिए यह एक गहरा आघात है। वरिष्ठ कवि और संवेदनशील रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर कवि कुमार विश्वास ने भावुक शब्दों में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
कुमार विश्वास ने कहा कि 70 और 80 के दशक की उनकी पीढ़ी के लिए विनोद कुमार शुक्ल केवल एक कवि नहीं बल्कि अनुभव थे, जिन्हें पढ़ना, सुनना और देखना अपने-आप में मानवीय संवेदना से जुड़ने जैसा था।

उन्होंने कहा कि जिस तरह मुक्तिबोध और निराला को देखने का अवसर उनकी पीढ़ी को नहीं मिला, उसी तरह विनोद कुमार शुक्ल ऐसे जीवंत कवि थे जिनके साथ संवाद का सौभाग्य मिला। कुमार विश्वास ने उनकी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौन संवाद, करुणा और साथ चलने की मानवीय समझ ही उनकी कविता की आत्मा थी।

कुमार विश्वास ने यह भी कहा कि आज के वैश्विक बिखराव और असमंजस के समय में ऐसे कवियों की सबसे अधिक आवश्यकता थी। उन्होंने इसे न केवल छत्तीसगढ़ या भारत बल्कि पूरे विश्व की कविता के लिए बड़ी क्षति बताया।
उन्होंने बताया कि हाल ही में साहित्य उत्सव में विनोद कुमार शुक्ल के आने की आशा थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।

कुमार विश्वास ने कहा कि मंचीय वाचिक परंपरा और पूरी साहित्यिक दुनिया की ओर से वे आज उन्हें अंतिम प्रणाम करने आए हैं और भारतीय कविता सदैव उनके अवदान को स्मरण रखेगी।

विवरण :: कुमार विश्वास ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का निधन भारतीय कविता के विशिष्ट युग का एक महत्वपूर्ण अवसान है। यह विशेष रूप से मेरी पीढ़ी के उन लोगों के लिए और भी अधिक मायने रखता है, जो 70 के दशक में जन्मे हैं और जिनकी थोड़ी बहुत साहित्यिक समझ और चेतना 80 के दशक में विकसित हुई। ऐसे समय में, विनोद कुमार शुक्ल उन नामों में से एक थे, जिनका पढ़ना, देखना और सुनना अपने आप में एक गहरा और समृद्ध अनुभव था।

हम, 70 और 80 के दशकों में जन्मे लोगों के लिए, एक प्रकार का दुर्भाग्य यह रहा कि हमने महान कवियों जैसे मुक्तिबोध और निराला को देखने का अवसर नहीं पाया। फिर भी, हम अपने समय में एक ऐसे जीवित कवि को प्रस्तुत कर सकते थे, जो मानवीय संवेदनाओं के गहन पड़ताल में लगातार व्यस्त रहें। जब मैं पूरे विश्व में यात्रा करता हूं, तो किसी भी भाषा के व्यक्ति के साथ मौन संवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर, हर बार विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं मेरे मन में ताजा हो जाती हैं।

एक समय, मैंने एक हताश व्यक्ति को बैठा हुआ देखा और उसकी ओर हाथ बढ़ाया। उस व्यक्ति को मैं नहीं जानता था, लेकिन उसकी हताशा को मैंने पहचाना था। उसने मेरा हाथ थामा और खड़ा हो गया, हालांकि वह मुझे नहीं जानता था, लेकिन हाथ बढ़ाने की क्रिया को वह भलीभांति समझता था। हम दोनों थोड़ी देर चुपचाप एक साथ चले, एक दूसरे को नहीं जानने के बावजूद, हम साथ चलने की इस सहजता को समझते थे। यह अनुभव वास्तव में विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं का एक अद्भुत उदाहरण था, जो मानव संवेदनाओं के आपसी जुड़ाव और समझ को उजागर करता है।
ऐसे समय में जब वैश्विक बिखराव की स्थिति अत्यधिक बढ़ गई है और असंशय की भावना विभिन्न स्तरों पर फैली हुई है, तब कवियों की आवश्यकता समाज के लिए खासकर महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे देश की विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों और साहित्यिक परंपराओं में कविता का एक महत्वपूर्ण स्थान हैं। यह न केवल छत्तीसगढ़ की या भारत की बात है, बल्कि विश्व कविता के क्षेत्र में भी एक बड़ा नुकसान हुआ है। यह समय हमें यह याद दिलाता है कि कैसे कविता हमारे समाज की संवेदनाओं और विचारों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है।

हालांकि, इस संदर्भ में, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री ने हाल ही में कवियों की स्वास्थ्य और कल्याण के विषय में जानकारी ली थी। जब मुख्यमंत्री से मिलने का अवसर आया, तब मैंने स्वयं मुख्यमंत्री से फोन करके जानकारी ली थी। उस समय हम सभी को यह आशा थी कि साहित्य उत्सव में वह उद्घाटन समारोह के लिए पधारेंगे और हमें उनके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। हम सभी उनके प्रति अपने सम्मान और श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए तत्पर थे।

परंतु, नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था, और इस कठिन समय में हमने भारतीय कविता और हिंदी कविता के योगदान को हमेशा के लिए याद रखने का प्रण लिया है। आज, मैं यहां उनकी स्मृति में अंतिम प्रणाम करने के लिए उपस्थित हुआ हूँ। कल, हम बिलासपुर में थे, मंच पर चढ़ने से पहले हमें पता चला कि वहाँ लगभग 15,000 से 20,000 लोग एकत्रित थे। उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, पूरी कैबिनेट और केंद्र के मंत्री भी वहां आ रहे थे। इस संदर्भ में, जनता ने इस निर्णय को खुले दिल से स्वीकार किया। हम ने श्रद्धांजलि अर्पित की, उनके चित्र के सामने सबने अपने विचार साझा किए, और जनता ने भी अपने भावनाओं को प्रकट किया। यह एक ऐसा क्षण था, जहां साहित्य और समाज का आपस में गहरा जुड़ाव देखने को मिला।

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