अब बदल जाएगा पूरा माहौल
वाणी की मिठास ही मनुष्य की सच्ची पहचान बनती है
कथा…..
अमृत टुडे ,रायपुर /छत्तीसगढ़
एक गुरु अपने आश्रम में ध्यानमग्न थे। उसी समय उनके तीन शिष्य प्यास से व्याकुल होकर उनके चरणों में उपस्थित हुए। एक शिष्य ने गुरु से जल की आवश्यकता बताई। गुरु ने पास के गाँव में रहने वाले गोपाल गोयल के घर जाकर पानी माँगने को कहा।
पहला शिष्य अहंकार से भरा हुआ वहाँ पहुँचा और रूखे स्वर में बोला, “जल जल्दी दीजिए, मुझे बहुत प्यास लगी है।” गोपाल गोयल ने उसकी कठोर वाणी सुनकर पानी देने से मना कर दिया।
दूसरा शिष्य कुछ विनम्र तो था, पर उसकी बातों में भी आग्रह और औपचारिकता से अधिक आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने कहा, “मुझे प्यास लगी है, पानी मिल जाए तो अच्छा होगा।” गोपाल गोयल ने इस बार भी पानी देने से इंकार कर दिया।
तीसरा शिष्य पूर्ण विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और बोला, “गोपाल बाबू, मुझे बहुत प्यास लगी है। यदि आप कृपा करें तो थोड़ा जल मिल जाए।” यह सुनते ही गोपाल गोयल मुस्कुराए, भीतर गए और ठंडे मटके से जल लाकर प्रेमपूर्वक उसे पिला दिया।
तीनों शिष्य लौटकर गुरु के पास आए। गुरु ने पूछा, “क्या तुम्हें पानी मिला?” तीसरे शिष्य ने कहा, “हाँ गुरुदेव, मुझे जल मिल गया।” गुरु ने पहले दो शिष्यों से पूछा कि उन्हें पानी क्यों नहीं मिला। वे बोले, “गोपाल गोयल पक्षपाती हैं, इसलिए उन्होंने हमें पानी नहीं दिया।”
गुरु ने शांत स्वर में समझाया, “गोपाल गोयल पक्षपाती नहीं थे। तुम्हारी वाणी और व्यवहार अलग‑अलग थे, इसलिए परिणाम भी अलग रहा। मनुष्य की असली पहचान उसके वस्त्र, पद या बल से नहीं, बल्कि उसके शब्दों और व्यवहार से होती है।” यह सुनकर दोनों शिष्यों को अपनी भूल समझ में आ गई।
सीख….
वाणी में नम्रता और व्यवहार में सम्मान हो, तो सबसे कठोर मन भी पिघल जाता है।
यह कथा सिखाती है कि सही शब्द केवल काम नहीं बनाते, रिश्ते भी बनाते हैं।
संक्षिप्त सोशल संस्करण…
शब्दों का व्यवहार ही मनुष्य की सच्ची पहचान है।
अहंकार से माँगा गया जल नहीं मिला, जबकि विनम्रता से माँगा गया जल प्रेमपूर्वक दिया गया।
यह कथा याद दिलाती है कि वाणी का सौंदर्य ही संबंधों की शक्ति है।

,, *लघु कथाएं*,
,,शब्दों का व्यवहार,,
गुरु घंटाल अपने आश्रम में बैठे हुए थे ध्यान मग्न अवस्था में चिंतन करते ही जा रहे थे उसे समय गुरु के तीन शिष्य गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर खड़े होते हैं
एक शिष्य ने कहा गुरुदेव मेरे को बहुत ज्यादा प्यास लग रही है मेरे को पानी पीना है पानी कहां मिलेगा
गुरु ने कहा गांव में जो गोपाल गोयल का घर है वह अपने घर पर बैठा हुआ है उससे जाकर तुम अपनी मांगों
शिष्य गोपाल गोयल के घर पर पहुंच जाता है,, अहंकार में बोलता है अरे जल्दी पानी दे मुझे प्यास लगी है
गोपाल गोयल पोस्ट की तरफ देखा है पानी देने से बिल्कुल इनकार कर देता है
दूसरा शिष्य पहुंचता है , थोड़ा सा विनम्वर होता है मुझे प्यास लगी है आनी चाहिए अगर दोगे तो अच्छा रहेगा
गोपाल गोयल उसकी तरफ देखा है थोड़ी देर बाद पानी देने के लिए बिल्कुल मना कर देता है
तीसरा शिष्य पहुंचता है, अपने दोनों हाथ विनम्रता के साथ जोड़कर खड़ा हो जाता है गोपाल बाबू मेरे को बहुत ज्यादा प्यास लगी है अगर आप कृपा करें तो थोड़ा जल मिल जाए
गोपाल गोयल मुस्कुराना प्रारंभ कर देता है तत्काल उड़ता है ठंडे-ठंडे मटके में से ठंडा ठंडा पानी लाकर प्रेम से पिलाना प्रारंभ कर देता है
तीनों शिष्य अपने गुरु के पास में पहुंच जाते हैं
क्या तुम्हारे को पीने के लिए पानी मिल गया है गुरु ने प्रश्न पूछा
दो शिक्षकों का नहीं तीसरी शिष्याने का गुरुदेव मिल गया है
गुरु ने फिर प्रश्न दो शिष्यों से किया क्या बात है तुम्हारी दोनों को पीने के लिए पानी क्यों नहीं मिला
दोनों शिष्यों ने अखडता के साथ कहा गुरुदेव गोपाल गोयल लगता है पक्षपाती है इसलिए हमारे को पानी नहीं मिला
गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा गोपाल गोयल कभी भी पक्ष पाती नहीं हो सकता है गोपाल गोयल नहीं तुम्हारी बनी अलग-अलग थी इसलिए तुम्हारे को पानी नहीं मिला पीने के लिए
गुरु अपने तीसरी शिष्य की तरफ देखते हुए कहा बेटा क्या बात है तुम्हारे को पानी मिल गया गोपाल गोयल ने तुम्हारा सम्मान भी किया
हां गुरुदेव गोपाल गोयल ने मेरे को बहुत ही प्रेम से आदर्श सम्मान से पानी पिलाकर मेरी प्यास को शांत करने का प्रयास किया
गुरु ने ज्ञान प्रदान करते हुए कहा मनुष्य की असली पहचान उसके कपड़ों पद प्रतिष्ठा ताकत से नहीं होती है उसकी असली पहचान उसके शब्दों से व्यवहार से होती है
क्या सुनते ही दोनों शिष्यों को अपनी गलती का एहसास होना प्रारंभ हो जाता है उनके मुखारविंद से केवल एक ही शब्द निकलता है वह शब्द था
,, शब्दों का व्यवहार,,
अचार्य भूपेंद्र का कथन
