वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि…..
नरेंद्र मोदी वह नेतृत्व हैं जो इतने बड़े-बड़े निर्णय ले सकते हैं जैसा जीएसटी 2.0 लाने का उन्होंने काम किया है।
रायपुर, अमृत टुडे। जिस दिन आयकर में 12 लाख की छूट की घोषणा की गई थी, वह क्षण आज भी मेरे मन में ताजा है। उस दिन, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में 10 लाख तक की छूट देने की प्रक्रिया पर अमल करती है, तो वे इस पेशकश पर गंभीरता से विचार करने को तैयार हैं। इस प्रकार के विचार विमर्श के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के कल्याण के दृष्टिकोण से 12 लाख तक की छूट को लागू करने का साहसी निर्णय लिया। इसके साथ ही, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) की 2.2 संशोधन के माध्यम से 300 से अधिक वस्तुओं की कीमतों में कमी की गई, जिससे लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

भारत, जो कि 140 करोड़ की विशाल जनसंख्या वाला एक देश है, के लोगों की भलाई और सुविधा सुनिश्चित करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। उन्होंने इस महत्वपूर्ण निर्णय को लेने के लिए राजस्व और टैक्स संग्रह की चिंताओं को दरकिनार करते हुए यह सुनिश्चित करने का निर्णय लिया कि जनता के हाथ में अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध हों। जब सामान की कीमतों में कमी होती है, तो लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि होती है और उनकी बचत करने की क्षमता भी बढ़ती है, जिससे अंततः समग्र अर्थव्यवस्था को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णय को एक व्यापक आर्थिक दर्शन के तहत देखा जा सकता है, जिसके प्रतीक स्वरूप हमें बाजारों में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहे हैं। आर्थिक गतिविधियों में बहाली और वृद्धि से न केवल लोगों की जिन्दगी में सुधार होता है, बल्कि ये समग्र रूप से देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते हैं।

22 तारीख के बाद, सभी को यह ध्यान से देखना चाहिए कि कैसे हमारे देश की अर्थव्यवस्था और उसकी आम जनता, जिसे हम जनार्दन के नाम से भी जानते हैं, एक नई सकारात्मक ऊंचाई की ओर तेजी से बढ़ने वाले हैं। यह प्रक्रिया न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि एक नई दिशा देने वाली भी है। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे राजनीतिक क्षेत्र में, विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी में, आपसी सहयोग और प्रतिस्पर्धा का खेल निरंतर चलता रहता है, जहां विभिन्न नेता एक-दूसरे को उखाड़ने और उठाने के लिए रणनीतियां बनाते रहते हैं।
उदाहरण के रूप में मध्य प्रदेश की राजनीति को लें, जहां पर विभिन्न नेताओं को किस प्रकार से आगे बढ़ाया गया और कौन सी परिस्थितियों में वे अपेक्षाकृत नीचे गिर गए, इस पर सभी की नजरें हैं। इसी प्रकार, राजस्थान में भी, सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच के उछाल-गिरावट के खेल को देशभर में देखा गया है, जिसने राजनीतिक परिदृश्य में काफी दिलचस्प मोड़ लाया।

सचिन पायलट, छत्तीसगढ़ में अपनी आकांक्षाओं को कुछ हद तक दबाकर, जहां काम कर रहे हैं, वहां की जनता उनकी भूमि में उनकी भूमिका को बड़े ध्यान से देख रही है। सभी को इस बात का भली-भांति ज्ञान है कि सचिन पायलट की क्या स्थिति और उनके कार्यों का दायरा क्या है, वहीं अशोक गहलोत की भूमिका भी इस राजनीतिक खेल में महत्वपूर्ण है। यह दोनों नेताओं की गतिशीलता हमारे समग्र राजनीतिक परिवेश को प्रभावित कर रही है, और इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
कांग्रेस की राजनीति को केवल एक साधारण राजनीतिक क्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता; वास्तव में, यह सट्टा लुलुकता की राजनीति का प्रतीक है। सत्ता के लोभ के आचरण में, विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास कांग्रेस की परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, और यह उसी नकारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है, जो कि कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति में गहराई तक समाहित है। इसके परिणामस्वरूप, जब कांग्रेस वोट चोरी जैसे अनर्गल आरोप लगाने में व्यस्त है, तब वह राष्ट्र की अस्मिता और उसके शौर्य के प्रतीकों को भुला चुकी है, और यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि देश के राजनीतिक माहौल को भी प्रभावित कर रही है।
इतिहास में, कांग्रेस ने संविधान का गंभीर दुरुपयोग किया है, जब उन्होंने आपातकाल लागू किया। इस अवधि के दौरान, उन्होंने केंद्रीय सरकार के दायरे में 356 के तहत चुनी गई सरकारों को गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जो लगभग सेंचुरी के समान थी। ऐसे नकारात्मक कार्यों को अंजाम देने वालों की ओर से आज भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं; यह एक वास्तविकता है जो भारतीय राजनीति के नैतिक आधार को गिरा रही है। ऐसे आरोपों की ओट में छिपे हुए स्वार्थों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को स्पष्ट रूप से समझा जाना आवश्यक है, ताकि समाज को इस असामान्य स्थिति से अवगत कराया जा सके।
उनकी लोकप्रियता देश के भीतर और विश्व स्तर पर लगातार और तेजी से बढ़ती जा रही है, जबकि कांग्रेस एक डूबती नाव के समान हो चुकी है, जिसके कारण वे अनर्गल और निराधार आरोप लगाकर जनता को भ्रमित करने की एक नाकाम कोशिश कर रहे हैं। जब भी नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विकास की नई ऊँचाइयों को छुआ है, तब-तब कांग्रेस और उनके सहयोगी गठबंधन ने निरर्थक आरोपों का सहारा लिया है।
हालांकि, भारत के नागरिकों ने हर बार कांग्रेस और एनडी गठबंधन के पदाधिकारियों द्वारा उठाए गए झूठे आरोपों का मुंह तोड़ जवाब दिया है। वर्तमान में जिन तरीकों से कांग्रेस आरोप लगा रही है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आगामी समय में भारतीय जनता इसे समझेगी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत किस प्रकार से ऊँचाइयों को छू रहा है, इस बात को भली-भांति पहचान लेगी।
हमारी आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने के कार्यों के बीच, कांग्रेस के लोग इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्य में जनता इस स्थिति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया अवश्य प्रकट करेगी, जिससे कांग्रेस को स्पष्ट कर दिया जाएगा कि वे किस प्रकार की राजनीति कर रहे हैं।
अंग्रेजों के समय में कौन व्यक्ति कितनी निकटता से उनके साथ जुड़ा था, और राजाओं एवं राजवंशों की जीवनशैली को लेकर पूरे देश में जानकारी फैली हुई थी। इन पहलुओं के बारे में स्पष्टता और ज्ञान सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं। मुझे यह बताने में गर्व महसूस होता है कि भारतीय जनता पार्टी की एक ही नीति है, जिस पर सम्पूर्ण देश की नज़र और विश्वास है। यह नीति है “सम्पूर्ण न्याय और सभी के लिए न्याय”।
हमारे देश की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का संकल्प लेते हुए, ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत को अपनाते हुए, यदि भारत को एक सशक्त सांस्कृतिक आधार वाले देश के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थापित करना संभव है, तो वह कार्य निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में संपन्न होता है। यह पार्टी केवल राजनीतिक लाभ के लिए क्षणिक उपायों पर निर्भर नहीं करती, चाहे कोई भी समय क्यों न हो।
इंदिरा गांधी के शासनकाल में, जब साधुओं ने गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए विधेयक लाने का समर्थन किया, तो उनके साथ अत्यंत कठोरता से निपटा गया और उन पर गोलियाँ चलाई गईं। वहीं, नेहरू जी द्वारा 1956 में लाए गए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के संदर्भ में बात करें, तो माताओं और बहनों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम था। हालांकि, माइनॉरिटी पर आधारित राजनीतिक दबाव के कारण यह अधिनियम पूरी तरह से लागू नहीं हो सका।
जब सोनिया गांधी ने अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का नियंत्रण संभाला, तब प्रधानमंत्री के माध्यम से यह बात सामने आई कि इस देश के संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि किस प्रकार राजनीतिक निर्णयों में सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभावों का स्थान है।
राजीव गांधी के शासनकाल में एक अत्यंत विवादास्पद घटना घटी, जिसे शाहबानो प्रकरण के नाम से जाना जाता है। इस प्रकरण में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम मातृ के लिए भरण-पोषण का अधिकार सुनिश्चित किया, जो कि उनके अधिकारों की एक महत्वपूर्ण पहचान थी। हालाँकि, इसके बाद भी मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव के चलते, और राजनीतिक लाभ के लिए अपिजमेंट की राजनीति का ध्यान रखते हुए, राजीव गांधी ने इस निर्णय के खिलाफ कदम उठाया और पीछे हट गए। यदि आप कांग्रेस के इतिहास में किसी भी युग या पीढ़ी पर ध्यान देंगे, तो आपको इस प्रकार की अपार्टमेंट की राजनीति के स्पष्ट उदाहरण मिलेंगे। यही कारण है कि आज पूरे देश की जनता ने इन्हें नकारना शुरू कर दिया है, क्योंकि लोगों के मन में इनके प्रति असंतोष बढ़ गया है।

